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अमित जी, सिर्फ मसालों से ही भोजन स्वादिष्ट नहीं बन जाता

Posted On: 23 Jan, 2017 में

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अभी कुछ दिनों से टी.वी. पर #एवरेस्टमसालों का एक विज्ञापन आ रहा है जिसमें अमिताभ बच्चन अपने दोस्त की माताजी के द्वारा बनाए गए खाने की आलोचना करते दिखाए गए हैं। बात ज़रा कचोटती है कि वह आदमी

जिसकी अदाकारी का सारा जहां कायल है, उससे भी ज्यादा उसके संस्कार, उसकी भाषा पर पकड़, उसकी नम्रता, उसकी तहजीब, उसकी अपने पिताजी और माताजी के प्रति आदर भावना ने लोगों को उसका मुरीद बना रखा हो, वह दूसरे की माँ का इस तरह से मख़ौल कैसे उड़ा सकता है ! कहा जा रहा है कि वे तो कलाकार हैं उन्हें जैसा कहा गया उन्होंने कर दिया ! गल्ती विज्ञापन बनाने वालों की है। ठीक है पर आज जिस ऊंचाई पर अमित जी हैं और जितना बड़ा उनका कद है, तो कोई भी जबरदस्ती उनसे कुछ नहीं करवा सकता।

विज्ञापन दाताओं का मुख्य ध्येय रहता है उनको अनुबंधित करना, जहां ऐसा हो गया वे अपनी सफलता के प्रति निश्चिंत हो जाते हैं और समझते हैं कि कुछ भी अगड़म-बगड़म बना दो, पब्लिक हाथों-हाथ ले लेगी। ज्यादातर ऐसा ही होता है। इधर शायद अति व्यस्तता या संबंधों की मजबूरी के कारण या कभी-कभी जाने-अंजाने ऐसा हो जाता होगा जब कलाकार का “कंटेंट” पर ध्यान ना जा पाता हो और कुछ ऐसा ही घटित हो जाता है जो उनकी छवि के अनुकूल नहीं होता।

विज्ञापन में अमित जी अपने दोस्त के बुलावे पर उसके घर जा दोस्त की माँ द्वारा बनाए गए भोजन को करने के बाद वापस आकर खाने की आलोचना करते दिखाए गए हैं। चाहे यह विज्ञापन ही है पर माँ तो माँ होती है, उसके प्रति नुक्ताचीनी किसी के भी गले नहीं उतरती, वह भी बच्चन जैसी शख्शियत के द्वारा की गयी ! माँ चाहे जैसा भी खाना बनाए उसका स्वाद उसके बच्चों को सदा प्रिय होता है। यदि वह बेस्वाद होता तो क्या उनका दोस्त उन्हें खाने पर बुलाता ? चलिए मान लेते हैं बच्चे अपनी माँ द्वारा बनाए गए भोजन में कमियां नहीं निकाल पाते, पर जब एक बार उसका स्वाद पसंद नहीं आया तो वहां बार-बार क्यों जाते हैं ? क्या सिर्फ दोस्त की माँ को बार-बार अपने साथ, व्यवसायिक रूप से तैयार किए गए मसालों को ले जाकर शर्मिंदा करने ? पहली बार के बाद ही विनम्रता पूर्वक दोस्त को किसी बहाने से मना भी तो किया जा सकता था और दूसरी बात भोजन सिर्फ मसालों से ही तो स्वादिष्ट नहीं बन जाता !!

क्षमा कीजिएगा #अमितजी, आपके स्तर, आपकी ख्याति के लायक बिल्कुल नहीं है यह विज्ञापन ! बहुत जरूरी था तो माँ की जगह दोस्त की पत्नी का नाम लिया जा सकता था ! उसमें भी शिष्टता नहीं दिखती हो तो खानसामे को बलि का बकरा बनाया जा सकता था। विज्ञापन ही सही माँ तो माँ होती है उसकी तौहीन करना वह भी बार-बार, किसी भी तरह, कभी भी सही नहीं ठहराया जा सकता !

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