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कोई तो कारण होगा, पूजा-स्थलों में प्रवेश के प्रतिबंध का !

Posted On: 29 Dec, 2017 lifestyle में

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हमारे देश में कुछ धर्म-स्थल ऐसे हैं, जहां प्रवेश के उनके अपने नियम हैं, जिन पर काफी सख्ती से अमल किया जाता है। इसको ले कर काफी बहस-बाजी भी होती रही है, विरोध दर्ज करवाया जाता रहा है, आंदोलन होते रहे हैं, हो-हल्ला मचा है ! और यह सब उन लोगों द्वारा ज्यादा किया जाता है जिन पर कोई पाबंदी लागू नहीं होती। कुछ लोग जरूर ऐसे हैं जो इंसान की बराबरी के हिमायती होते हैं जो अच्छी बात है; पर विडंबना यह भी है कि ज्यादातर प्रतिवाद करने वालों को प्रतिबंधित वर्ग से उतनी हमदर्दी नहीं होती जितना वे दिखावा करते हैं नाहीं उन्हें वर्षों से चली आ रही ऐसी व्यवस्था को बदलने की अदम्य इच्छा होती है, उनका ध्येय किसी भी तरह खबरों में बने रहना होता है ! अपने को कुछ अलग दिखाने की लालसा होती है, प्रसिद्धि पाने की चाह इनसे कुछ भी करवा लेती है इसीलिए कुछ दिनों धूम-धड़ाका मचा ये गायब हो जाते हैं। नहीं तो कहाँ है वह कन्या जिसने जबरदस्ती शिंगणापुर के शनि-चबूतरे पर चढ़ने को ले कर हंगामा मचाया था। क्यों नहीं ऐसे लोग उन तथाकथित बाबाओं के विरुद्ध मोर्चा खोलते जो भगवान् के नाम पर ज्यादातर महिलाओं का ही शोषण करते हैं ! क्यों नहीं उन पंथों के खिलाफ आवाज उठाते जो जबरन धर्म परिवर्तन करवाने का दुःसाहस करते हैं ! सिर्फ इसलिए क्योंकि वहां शायद नाम मिले ना मिले पर जान को जरूर खतरा होता है !!
सोचने की बात यह है कि ऐसी जगहों की व्यवस्था संभालने वाले लोग, विद्वान, धर्म को समझने वाले, धर्म-भीरु होते हैं। उनको क्या यह पता नहीं होता कि उनका वैसा रवैया गलत है ? क्या वे नहीं जानते कि प्रभू के यहां सब बराबर होते हैं ? क्या उन्हें मालुम नहीं कि ऊपर वाले के यहाँ कोई भेद-भाव नहीं होता ! यदि ऐसा होता तो इंसान भी अपनी हैसियत के मुताबिक़ पैदा होता और मरता ! एक ही तरह से सबका जन्म या मृत्यु नहीं होती ! फिर क्यों भगवान् के घर में ही इंसान और इंसान में फर्क किया जाता है ? कोई तो कारण होगा ?
इतिहास गवाह है कि अलग-अलग संप्रदायों के अलग-अलग मतों में, विरोधी मान्यताओं, अपने पंथ को श्रेष्ठ मनवाने की जिद, अपने इष्ट को सर्वोपरि मानने के हठ के कारण अक्सर टकराव होते रहे है। एक-दूसरे को नीचा दिखाने के प्रयास में जन-धन-स्थल को हानि पहुंचाने के उपक्रमों को भी मौके-बेमौके, जानबूझ कर अंजाम दिया जाता रहा है। हो सकता है ऐसी मानसिकता वाले लोग दूसरे पंथ के पूजा-स्थल में जा गैर-वाजिब हरकतें करते हों ! शुचिता का ध्यान ना रखते हों ! स्थल के सम्मान में कोताही बरती जाती हो ! पूजा-अर्चना में बाधा उत्पन्न करते हों, और वैसे कुछ अवांछनीय, असमाजिक, गैरजिम्मेदाराना लोगों की हरकतों का खामियाजा औरों को भी भुगतना पड़ गया हो। कुछ तो प्रयोजन जरूर होगा किसी को प्रतिबंधित करने का। अभी बहुत दिन नहीं हुए जब सोशल  मीडिया पर एक फोटो अक्सर दिख जाती थी जिसमें एक लड़का किसी मंदिर में शिवलिंग पर जूते समेत एक पैर रखे दिखाई पड़ता था। भले ही वह सच हो ना हो या फोटो से छेड़-छाड़ की गयी हो; पर वैसा या ऐसा करने वाले की दूषित मानसिकता का तो पता चलता ही था ना !! हो सकता है कुछ स्थल महिलाओं के लिए सुरक्षित न होते हों, जैसे शिंगणापुर के शनिदेव का चबूतरा, जहां हर समय तेल फैला रहता है और गीले कपड़ों में जाने का प्रावधान है, इसलिए हो सकता है एक तो गीले कपडे और फिर तेल, महिलाओं को किसी भी तरह के खतरे से बचाने के लिए वहां चढ़ने से मना किया जाता हो !

रही दूसरे पक्ष की बात उन्हें भी अब बदलते हालात में अपने नियम-कानून की समीक्षा करनी चाहिए साफ़ तौर पर । गहराई से सोच-समझ कर नए विधानों को लागू करना चाहिए। सिर्फ, होता आ रहा है इसीलिए किसी बात को होते नहीं देना चाहिए। नहीं तो उस मठ जैसी बात हो जाएगी; जहां गुरूजी के पालतू बिल्ली के उत्पात के कारण आराधना के समय उसे बांधने का आदेश, उनके बाद परंपरा ही बन गया था और हर पूजा के पहले बिल्ली को बांधना अवश्यंभावी माना जाने लग गया था ! वैसे भी अब समाज पहले की अपेक्षा ज्यादा जागरूक है इसलिए उसे अब पीपल के वृक्ष या तुलसी के पौधे को बचाने के लिए, या गाय की उपयोगिता के कारण उन्हें देवी-देवता से जोड़ने की आवश्यकता नहीं रह गयी है उसे साफ़ तौर पर सीधे-सादे शब्दों में सच्चाई बता देना सबके लिए फायदेमंद रहेगा।  जिससे समाज बेकार की बहसबाजी से बचा रहे।

Web Title : kuchhalagsa

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